Digital payments surge across India, but currency in circulation continues to rise, making future cash demand harder for RBI to predict
मुंबई (Economy India): भारत में डिजिटल भुगतान व्यवस्था ने पिछले कुछ वर्षों में अभूतपूर्व गति से विस्तार किया है। UPI, मोबाइल बैंकिंग, डेबिट और क्रेडिट कार्ड तथा अन्य डिजिटल माध्यमों ने देश में भुगतान के तरीके को पूरी तरह बदल दिया है। चाय की दुकान से लेकर बड़े शॉपिंग मॉल, किराना स्टोर से लेकर ऑनलाइन कारोबार और बिल भुगतान तक, डिजिटल लेनदेन अब आम जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं।
लेकिन डिजिटल भुगतान की इस तेज रफ्तार के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था में एक दिलचस्प और महत्वपूर्ण विरोधाभास भी देखने को मिल रहा है। डिजिटल भुगतान बढ़ रहा है, लेकिन इसके साथ ही प्रचलन में नकदी भी बढ़ रही है।
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के डिप्टी गवर्नर एस. सी. मुर्मू ने इस स्थिति को ‘कैश पैराडॉक्स’ के रूप में रेखांकित किया है। उनके मुताबिक डिजिटल भुगतान में तेजी के बावजूद प्रचलन में मुद्रा में वृद्धि जारी है और इस वजह से भविष्य में नकदी की मांग का अनुमान लगाना केंद्रीय बैंक के लिए अधिक चुनौतीपूर्ण हो गया है।
मुर्मू ने यह बात 13 अगस्त को जकार्ता में बैंक इंडोनेशिया की ओर से आयोजित नकदी पारिस्थितिकी तंत्र पर वैश्विक संगोष्ठी में कही।

डिजिटल भुगतान की क्रांति के बीच नकदी का बढ़ना क्यों महत्वपूर्ण है?
भारत ने डिजिटल भुगतान के क्षेत्र में जिस तेजी से प्रगति की है, उसने वैश्विक स्तर पर भी ध्यान आकर्षित किया है। UPI ने छोटे और बड़े दोनों तरह के लेनदेन को आसान बनाया है। मोबाइल फोन के माध्यम से कुछ ही सेकंड में भुगतान करने की सुविधा ने डिजिटल लेनदेन को व्यापक रूप से स्वीकार्य बना दिया है।
ऐसे में स्वाभाविक रूप से यह उम्मीद की जा सकती है कि डिजिटल भुगतान बढ़ने के साथ लोगों की नकदी रखने की जरूरत कम होगी।
लेकिन वास्तविकता में ऐसा पूरी तरह नहीं हुआ है।
लोग डिजिटल माध्यम से भुगतान कर रहे हैं, लेकिन साथ ही अपने पास नकदी भी रख रहे हैं। इसका मतलब है कि डिजिटल भुगतान और नकदी को केवल एक-दूसरे के विकल्प के रूप में देखना भारतीय अर्थव्यवस्था की पूरी तस्वीर नहीं बताता।
क्या है ‘कैश पैराडॉक्स’?
सरल शब्दों में समझें तो ‘कैश पैराडॉक्स’ का मतलब है—डिजिटल भुगतान का तेजी से बढ़ना और उसी समय अर्थव्यवस्था में नकदी की मात्रा का भी बढ़ते रहना।
यदि डिजिटल भुगतान नकदी का सीधा विकल्प होता, तो डिजिटल लेनदेन में वृद्धि के साथ नकदी की मांग में स्पष्ट गिरावट दिखाई देनी चाहिए थी। लेकिन भारत में दोनों रुझान एक साथ दिखाई दे रहे हैं।
यही विरोधाभास RBI के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि केंद्रीय बैंक को भविष्य की नकदी मांग का अनुमान लगाकर नोटों की छपाई और वितरण की योजना बनानी होती है।
डिजिटल भुगतान की बढ़ती लोकप्रियता ने नकदी की मांग को खत्म करने के बजाय उसके व्यवहार को अधिक जटिल बना दिया है।
नकदी का इस्तेमाल कम होने के बावजूद नकदी की मात्रा क्यों बढ़ रही है?
यह सवाल इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में है।
किसी अर्थव्यवस्था में नकदी की कुल मात्रा और नकदी से किए जाने वाले लेनदेन की संख्या हमेशा एक ही दिशा में नहीं चलती। लोग कम बार नकदी का इस्तेमाल कर सकते हैं, लेकिन अधिक मात्रा में नकदी अपने पास रख सकते हैं।
उदाहरण के लिए कोई व्यक्ति रोजमर्रा के कई भुगतान UPI से कर सकता है, लेकिन फिर भी आपात स्थिति, घरेलू खर्च या अन्य जरूरतों के लिए कुछ नकदी अपने पास रख सकता है।
इसी तरह कारोबारी डिजिटल भुगतान स्वीकार कर सकते हैं, लेकिन उन्हें नकदी की जरूरत अलग-अलग परिचालन खर्चों या स्थानीय लेनदेन के लिए बनी रह सकती है।
इसलिए डिजिटल लेनदेन की संख्या बढ़ना अपने आप में नकदी की मांग के समाप्त होने का संकेत नहीं है।
नकदी अभी भी भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ क्यों है?
भारत की अर्थव्यवस्था का आकार और विविधता नकदी की भूमिका को समझने के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।
देश में बड़े महानगरों से लेकर छोटे कस्बे और गांव तक अलग-अलग तरह के बाजार मौजूद हैं। सभी क्षेत्रों में डिजिटल बुनियादी ढांचे, बैंकिंग सेवाओं और इंटरनेट की पहुंच समान नहीं है।
ग्रामीण और अर्ध-शहरी अर्थव्यवस्था
ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय बाजारों, छोटे कारोबार और रोजमर्रा के लेनदेन में नकदी की भूमिका अभी भी महत्वपूर्ण है। डिजिटल भुगतान तेजी से पहुंच रहा है, लेकिन नकदी की उपयोगिता पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है।
छोटे कारोबार
छोटे दुकानदारों और व्यवसायों ने डिजिटल भुगतान को तेजी से अपनाया है, लेकिन उनके कारोबार में नकदी अभी भी एक महत्वपूर्ण भुगतान माध्यम हो सकती है।
आपातकालीन जरूरत
नकदी का सबसे बड़ा फायदा इसकी तत्काल उपलब्धता है। इंटरनेट, मोबाइल नेटवर्क, बिजली या बैंकिंग प्रणाली से जुड़ी किसी अस्थायी समस्या की स्थिति में नकदी भुगतान का भरोसेमंद विकल्प बनी रहती है।
भरोसा और आदत
भुगतान का व्यवहार केवल तकनीक पर निर्भर नहीं करता। लोगों की आदत, सुविधा और नकदी के प्रति भरोसा भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
डिजिटल भुगतान बढ़ने का मतलब ‘कैशलेस इंडिया’ नहीं
भारत में डिजिटल भुगतान के विस्तार को अक्सर कैशलेस अर्थव्यवस्था की दिशा में बड़ा कदम माना जाता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि डिजिटल भुगतान ने नकदी पर निर्भरता को कई क्षेत्रों में कम किया है।
लेकिन मौजूदा रुझान बताते हैं कि भारत पूरी तरह नकदी-विहीन अर्थव्यवस्था की ओर नहीं बढ़ रहा है।
इसके बजाय देश में मल्टी-चैनल भुगतान व्यवस्था विकसित हो रही है।
एक ही व्यक्ति अलग-अलग परिस्थितियों में अलग-अलग भुगतान माध्यमों का इस्तेमाल करता है। ऑनलाइन खरीदारी के लिए UPI, बड़े भुगतान के लिए बैंक ट्रांसफर या कार्ड और स्थानीय छोटे खर्चों के लिए नकदी का उपयोग किया जा सकता है।
यानी भविष्य की अर्थव्यवस्था में सवाल यह नहीं है कि नकदी रहेगी या डिजिटल भुगतान, बल्कि यह है कि दोनों किस तरह साथ-साथ काम करेंगे।
RBI के सामने असली चुनौती: भविष्य की नकदी मांग का अनुमान
RBI के लिए यह स्थिति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मुद्रा प्रबंधन एक जटिल प्रक्रिया है।
केंद्रीय बैंक को यह सुनिश्चित करना होता है कि अर्थव्यवस्था में जरूरत के मुताबिक पर्याप्त मात्रा में नोट उपलब्ध रहें।
इसके लिए कई स्तरों पर योजना बनानी पड़ती है—
- नोटों की मांग का अनुमान
- नोटों की छपाई
- पुराने और खराब नोटों को वापस लेना
- नए नोटों का वितरण
- बैंकों और मुद्रा भंडारों तक आपूर्ति
- अलग-अलग क्षेत्रों में नकदी की उपलब्धता सुनिश्चित करना
यदि भविष्य में नकदी की मांग का अनुमान गलत होता है तो इसका असर पूरी मुद्रा आपूर्ति व्यवस्था पर पड़ सकता है।
ज्यादा नकदी का अनुमान भी चुनौतीपूर्ण
नकदी की मांग का कम अनुमान लगाना समस्या पैदा कर सकता है, लेकिन जरूरत से ज्यादा नकदी की व्यवस्था करना भी आसान नहीं है।
नोटों की छपाई, परिवहन, सुरक्षा, भंडारण और वितरण से जुड़ी लागत होती है। इसलिए केंद्रीय बैंक को मांग का संतुलित अनुमान लगाना आवश्यक है।
डिजिटल भुगतान के तेजी से बदलते परिदृश्य ने इस अनुमान को और कठिन बना दिया है।
पुराने आर्थिक मॉडल यह मान सकते थे कि आय, आर्थिक वृद्धि और महंगाई में बदलाव के साथ नकदी की मांग का एक अपेक्षाकृत स्थिर संबंध होगा। लेकिन अब डिजिटल भुगतान जैसी नई तकनीक ने भुगतान व्यवहार में एक नया आयाम जोड़ दिया है।
डिजिटल भुगतान के आंकड़े अकेले पर्याप्त नहीं
RBI के लिए भविष्य की नकदी मांग का अनुमान लगाते समय केवल डिजिटल भुगतान की वृद्धि दर को देखना पर्याप्त नहीं होगा।
केंद्रीय बैंक को यह भी समझना होगा कि लोग डिजिटल भुगतान बढ़ने के बावजूद नकदी क्यों रखते हैं।
इसके लिए कई पहलुओं को देखना जरूरी हो सकता है—
आर्थिक वृद्धि: अर्थव्यवस्था जितनी बड़ी होगी, भुगतान और नकदी की जरूरत भी अलग तरीके से बदल सकती है।
आय का स्तर: आय बढ़ने के साथ लोगों के भुगतान और बचत व्यवहार में बदलाव आ सकता है।
महंगाई: वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों में वृद्धि होने पर समान मात्रा में खरीदारी के लिए अधिक मुद्रा की आवश्यकता हो सकती है।
डिजिटल पहुंच: इंटरनेट, स्मार्टफोन और बैंकिंग सेवाओं की पहुंच नकदी और डिजिटल भुगतान के बीच संतुलन को प्रभावित करती है।
उपभोक्ता व्यवहार: लोग डिजिटल भुगतान को अपनाने के बावजूद नकदी को सुरक्षा या सुविधा के लिए अपने पास रख सकते हैं।
‘कैश होर्डिंग’ और लेनदेन की जरूरत में अंतर
नकदी की मात्रा बढ़ने का मतलब हमेशा यह नहीं होता कि लोग अधिक नकदी खर्च कर रहे हैं।
कई बार लोग भविष्य की जरूरतों के लिए नकदी अपने पास रखते हैं। आर्थिक अनिश्चितता, आपातकालीन जरूरत या व्यक्तिगत वित्तीय व्यवहार के कारण नकदी रखने की प्रवृत्ति बढ़ सकती है।
इसलिए RBI के लिए यह समझना महत्वपूर्ण है कि बढ़ती नकदी का कितना हिस्सा वास्तविक लेनदेन की जरूरत से जुड़ा है और कितना हिस्सा लोगों की नकदी रखने की प्राथमिकता से।
बैंकिंग प्रणाली पर भी असर
नकदी और डिजिटल भुगतान के बीच बदलता संतुलन बैंकिंग प्रणाली के लिए भी महत्वपूर्ण है।
डिजिटल भुगतान से बैंक खातों के माध्यम से लेनदेन की गति बढ़ती है। वहीं नकदी की मांग के कारण बैंकों को पर्याप्त कैश उपलब्ध रखना पड़ता है।
इसका मतलब है कि भविष्य में बैंकों और RBI दोनों को एक साथ दो तरह की जरूरतों को पूरा करना होगा—डिजिटल भुगतान के लिए मजबूत तकनीकी बुनियादी ढांचा और नकदी के लिए मजबूत भौतिक वितरण नेटवर्क।
भारत में डिजिटल और नकदी अर्थव्यवस्था का सह-अस्तित्व
भारत का अनुभव यह संकेत देता है कि डिजिटल भुगतान और नकदी को प्रतिस्पर्धी माध्यमों के बजाय एक-दूसरे के पूरक के रूप में देखना अधिक उचित हो सकता है।
डिजिटल भुगतान जहां गति, सुविधा और रिकॉर्ड की सुविधा देता है, वहीं नकदी तत्काल भुगतान, व्यापक स्वीकार्यता और तकनीकी निर्भरता से स्वतंत्रता प्रदान करती है।
दोनों माध्यमों की अपनी-अपनी उपयोगिता है।
यही कारण है कि डिजिटल भुगतान में तेजी के बावजूद नकदी की मांग बनी रह सकती है।
वैश्विक स्तर पर भी महत्वपूर्ण मुद्दा
नकदी प्रबंधन की चुनौती केवल भारत तक सीमित नहीं है। दुनिया के कई देशों में डिजिटल भुगतान बढ़ने के बावजूद नकदी की भूमिका पर चर्चा जारी है।
अलग-अलग देशों में उपभोक्ता व्यवहार, बैंकिंग पहुंच, डिजिटल बुनियादी ढांचे और आर्थिक परिस्थितियां अलग हैं। इसलिए किसी एक देश का अनुभव दूसरे देश पर पूरी तरह लागू नहीं किया जा सकता।
जकार्ता में आयोजित वैश्विक संगोष्ठी में नकदी पारिस्थितिकी तंत्र पर चर्चा इस बात का संकेत है कि केंद्रीय बैंक और वित्तीय संस्थान बदलते भुगतान व्यवहार के बीच नकदी की भूमिका को लेकर लगातार अध्ययन कर रहे हैं।
भविष्य में कैसी होगी भारत की भुगतान व्यवस्था?
भारत की भुगतान व्यवस्था आने वाले वर्षों में और अधिक डिजिटल होने की संभावना है। UPI और अन्य डिजिटल माध्यमों का विस्तार जारी रह सकता है।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि नकदी पूरी तरह समाप्त हो जाएगी।
संभावना यह है कि भारत में एक ऐसी मिश्रित भुगतान व्यवस्था विकसित होगी जिसमें—
- डिजिटल भुगतान रोजमर्रा के अधिक से अधिक लेनदेन को संभालेगा,
- नकदी अपनी पारंपरिक भूमिका निभाती रहेगी,
- बैंकिंग प्रणाली दोनों माध्यमों को समर्थन देगी,
- और RBI को नकदी की मांग के लिए अधिक उन्नत पूर्वानुमान मॉडल विकसित करने होंगे।
उपभोक्ताओं के लिए इसका क्या मतलब है?
आम उपभोक्ता के लिए यह स्थिति भुगतान के अधिक विकल्प उपलब्ध होने का संकेत है।
डिजिटल भुगतान सुविधा और गति प्रदान करता है, जबकि नकदी उन परिस्थितियों में उपयोगी बनी रहती है जहां डिजिटल भुगतान संभव नहीं है या उपभोक्ता नकदी को प्राथमिकता देता है।
इसलिए आने वाले समय में भारत में ‘कैशलेस’ के बजाय ‘लेस-कैश और मल्टी-चैनल’ अर्थव्यवस्था की अवधारणा अधिक व्यावहारिक दिखाई देती है।
RBI के लिए नीति स्तर पर बड़ा सबक
एस. सी. मुर्मू की टिप्पणी का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि तकनीकी प्रगति के आधार पर आर्थिक व्यवहार के पुराने अनुमान हमेशा सही नहीं रह सकते।
डिजिटल भुगतान में तेज वृद्धि निश्चित रूप से भुगतान व्यवस्था को बदल रही है, लेकिन नकदी की मांग पर इसके प्रभाव को समझने के लिए अधिक गहन विश्लेषण की जरूरत है।
RBI को भविष्य में मुद्रा मांग का अनुमान लगाते समय डिजिटल भुगतान, आर्थिक गतिविधियों, उपभोक्ता व्यवहार, नकदी रखने की प्रवृत्ति और क्षेत्रीय अंतर जैसे कारकों को एक साथ देखना होगा।
डिजिटल भारत, लेकिन नकदी अभी भी जरूरी
भारत की डिजिटल भुगतान कहानी दुनिया की सबसे तेज बदलाव वाली वित्तीय कहानियों में से एक है। UPI और अन्य डिजिटल माध्यमों ने करोड़ों लोगों के भुगतान व्यवहार को बदल दिया है।
फिर भी नकदी की बढ़ती मात्रा यह स्पष्ट करती है कि डिजिटल क्रांति ने नकदी की जरूरत को खत्म नहीं किया है।
RBI के सामने अब चुनौती यह समझने की है कि डिजिटल भुगतान के बढ़ते इस्तेमाल के बीच लोग कितनी नकदी रखना चाहते हैं, किन परिस्थितियों में नकदी की मांग बढ़ती है और भविष्य में अर्थव्यवस्था को कितनी भौतिक मुद्रा की आवश्यकता होगी।
यही ‘कैश पैराडॉक्स’ भारत के मुद्रा प्रबंधन की अगली बड़ी चुनौती बन सकता है।
डिजिटल भुगतान भारत के भविष्य का महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन नकदी अभी भी वर्तमान अर्थव्यवस्था की महत्वपूर्ण जरूरत है। दोनों के बीच संतुलन बनाना ही भारत की विकसित होती भुगतान व्यवस्था की सबसे बड़ी विशेषता बन सकता है।
(Economy India)







